Last Updated on September 19, 2026 by अनुपम श्रीवास्तव
तस्वीरें सिर्फ पलों को कैद नहीं करतीं बल्कि उनमें छिपी कहानियों को भी बयां करती हैं।
अगर आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं और अपनी तस्वीरों को शब्दों का जादू देना चाहते हैं तो ये 200 फोटोग्राफी शायरी आपके लिए ही हैं!
चाहे आप एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर हों या फिर सोशल मीडिया पर अपनी यादें साझा करने के शौकीन, ये शायरियां आपके हर फोटो को और भी खास बना देंगी।
तो तैयार हो जाइए, अपनी तस्वीरों के साथ बेहतरीन शायरी जोड़कर उन्हें और यादगार बनाने के लिए!
आइए इन खूबसूरत पंक्तियों के साथ फोटोग्राफी के जादू को दिल से महसूस करें!

200 Best Photography Shayari in Hindi
1
एक तस्वीर में इतना जादू भर दिया,
लफ्ज़ों से भी ज्यादा बयाँ कर दिया।
लफ्ज़ों से भी ज्यादा बयाँ कर दिया।
2
कैमरा उठाया, नज़ारे कैद कर लिए,
जो लम्हे बीत गए, उन्हें हमेशा के लिए जिंदा कर लिए।
जो लम्हे बीत गए, उन्हें हमेशा के लिए जिंदा कर लिए।
3
तेरी हंसी की तस्वीर खींची थी कभी,
आज भी देखूं तो दिल मुस्कुरा जाता है।
आज भी देखूं तो दिल मुस्कुरा जाता है।
4
तस्वीरें नहीं, लम्हों की कहानी खींचते हैं,
जो दिखता नहीं, वो भी बयां करते हैं।
जो दिखता नहीं, वो भी बयां करते हैं।
5
हर तस्वीर की अपनी जुबां होती है,
जो कह न सकें, वो ये बयां करती है।
जो कह न सकें, वो ये बयां करती है।
6
फोटोग्राफी सिर्फ एक कला नहीं,
हर तस्वीर के पीछे एक एहसास छुपा होता है।
हर तस्वीर के पीछे एक एहसास छुपा होता है।
7
तस्वीरें खींचकर हमने वक्त को रोक दिया,
जो बीत चुका था, उसे हमने फिर से जी लिया।
जो बीत चुका था, उसे हमने फिर से जी लिया।
8
कैमरा वही देखता है, जो आंखों से छूट जाता है,
हर तस्वीर में एक अनसुना किस्सा होता है।
हर तस्वीर में एक अनसुना किस्सा होता है।
9
कुछ तस्वीरें धुंधली सही, पर यादें साफ होती हैं,
जो घड़ी गुजर गई, वो फिर से पास होती हैं।
जो घड़ी गुजर गई, वो फिर से पास होती हैं।
10
ख़ूबसूरती को महसूस करना ही फोटोग्राफी है,
हर तस्वीर के पीछे हर बार एक नई ही कहानी है।
हर तस्वीर के पीछे हर बार एक नई ही कहानी है।
11
कैमरा चलाया, ज़िन्दगी को रोक लिया,
लम्हों को तस्वीरों में समेट दिया।
लम्हों को तस्वीरों में समेट दिया।
12
जो कैमरा देख लेता है, वो आंखें नहीं देख पाती,
एक तस्वीर में कितनी गहराई होती है, ये दुनिया नहीं समझ पाती।
एक तस्वीर में कितनी गहराई होती है, ये दुनिया नहीं समझ पाती।
13
हर तस्वीर एक कविता है,
जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कहती है।
जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कहती है।
14
लम्हों को कागज़ पर उतारना फोटोग्राफी है,
यादों को ज़िंदा रखना इसकी खासियत है।
यादों को ज़िंदा रखना इसकी खासियत है।
15
तस्वीरें बदलती हैं, पर एहसास वही रहते हैं,
लम्हे जाते हैं, पर यादों में जिंदा रहते हैं।
लम्हे जाते हैं, पर यादों में जिंदा रहते हैं।
16
अल्फाज़ों से कह न सके जो,
एक तस्वीर ने बयान कर दिया वो।
एक तस्वीर ने बयान कर दिया वो।
17
फोटोग्राफी सिर्फ शौक नहीं,
हर तस्वीर में बसी होती है एक अनकही कहानी।
हर तस्वीर में बसी होती है एक अनकही कहानी।
18
खूबसूरत लम्हों को पकड़ने की चाह में,
हमने जिंदगी को कैमरे में सहेज लिया।
हमने जिंदगी को कैमरे में सहेज लिया।
19
एक तस्वीर वो लफ्ज़ कह देती है,
जो ज़ुबान नहीं कह पाती।
जो ज़ुबान नहीं कह पाती।
20
हर क्लिक के पीछे एक नज़रिया होता है,
फोटोग्राफर की नज़र में जादू बसा होता है।
फोटोग्राफर की नज़र में जादू बसा होता है।
21
एक फोटो की ताकत ये होती है,
जो बीत गया, उसे फिर से जी लेने देती है।
जो बीत गया, उसे फिर से जी लेने देती है।
22
हर तस्वीर एक कहानी कहती है,
कुछ हंसाती, कुछ रुलाती है।
कुछ हंसाती, कुछ रुलाती है।
23
सफर वही यादगार बनता है,
जिसकी तस्वीरें यादें बनकर जी उठती हैं।
जिसकी तस्वीरें यादें बनकर जी उठती हैं।
24
कैमरा तो बस एक जरिया है,
हकीकत तो फोटोग्राफर की नज़र में बसती है।
हकीकत तो फोटोग्राफर की नज़र में बसती है।
25
फोटोग्राफी एक अहसास है,
हर तस्वीर में छुपा इतिहास है।
हर तस्वीर में छुपा इतिहास है।
26
जो लफ्जों में बयां नहीं हो सकता,
वो तस्वीरों में कैद हो जाता है।
वो तस्वीरों में कैद हो जाता है।
27
एक अच्छी तस्वीर वही होती है,
जो देखने वाले की आत्मा तक पहुंच जाए।
जो देखने वाले की आत्मा तक पहुंच जाए।
28
तस्वीरों में वक्त ठहर जाता है,
बदलती दुनिया में कुछ तो स्थाई रह जाता है।
बदलती दुनिया में कुछ तो स्थाई रह जाता है।
29
हर तस्वीर में जिंदगी की झलक होती है,
बस देखने की नजर अलग होती है।
बस देखने की नजर अलग होती है।
30
फोटोग्राफी एक जुनून है,
हर तस्वीर में एक सुकून है।
हर तस्वीर में एक सुकून है।
31
हर तस्वीर अपने अंदर एक अहसास रखता है,
जो समझे वही असली फोटोग्राफर बनता है।
जो समझे वही असली फोटोग्राफर बनता है।
32
जो देखा, उसे कैमरे में उतार लिया,
एक पल को तस्वीर में सजा लिया।
एक पल को तस्वीर में सजा लिया।
33
फोटोग्राफी सिर्फ कैमरा नहीं,
यह लम्हों को कैद करने की कला है।
यह लम्हों को कैद करने की कला है।
34
एक क्लिक, एक पल, एक याद बन जाती है,
तस्वीरें कहानियों को फिर से जिंदा कर जाती हैं।
तस्वीरें कहानियों को फिर से जिंदा कर जाती हैं।
35
तस्वीरें धुंधली हो सकती हैं,
पर यादें हमेशा साफ रहती हैं।
पर यादें हमेशा साफ रहती हैं।
36
फोटोग्राफी एक खामोश कविता है,
जिसमें हर तस्वीर एक शेर है।
जिसमें हर तस्वीर एक शेर है।
37
जो तस्वीरें हम आज खींच रहे हैं,
वो कल की सबसे खूबसूरत यादें बनेंगी।
वो कल की सबसे खूबसूरत यादें बनेंगी।
38
फोटोग्राफी सिर्फ लेंस की बात नहीं,
यह दिल की नजर से देखने की कला है।
यह दिल की नजर से देखने की कला है।
39
एक फोटो में जो सच्चाई होती है,
वो कई कहानियों से ज्यादा गहरी होती है।
वो कई कहानियों से ज्यादा गहरी होती है।
40
फोटोग्राफी हमें वही दिखाती है,
जो हमारी आंखें अनदेखा कर देती हैं।
जो हमारी आंखें अनदेखा कर देती हैं।
41
हर क्लिक में एक नई दुनिया छुपी होती है,
हर तस्वीर में बसी एक अनकही गाथा होती है।
हर तस्वीर में बसी एक अनकही गाथा होती है।
42
वो तस्वीरें ही होती हैं,
जो बिछड़े लोगों को करीब ले आती हैं।
जो बिछड़े लोगों को करीब ले आती हैं।
43
तस्वीरों की खासियत ये होती है,
ये वक्त को भी मात दे देती हैं।
ये वक्त को भी मात दे देती हैं।
44
फोटोग्राफी सिर्फ कैमरे का खेल नहीं,
यह आंखों और दिल की साझेदारी है।
यह आंखों और दिल की साझेदारी है।
45
जो बात शब्द नहीं कह सकते,
वो तस्वीरें आसानी से कह जाती हैं।
वो तस्वीरें आसानी से कह जाती हैं।
46
फोटोग्राफी एक नजरिया है,
जिसमें खूबसूरती देखने का तरीका अलग होता है।
जिसमें खूबसूरती देखने का तरीका अलग होता है।
47
हर तस्वीर में छुपा होता है एक लम्हा,
जो वक्त गुजरने के बाद भी दिल में बस जाता है।
जो वक्त गुजरने के बाद भी दिल में बस जाता है।
48
हर तस्वीर में एक अहसास छुपा है,
जो बीत गया वो पास छुपा है।
जो बीत गया वो पास छुपा है।
49
क्लिक किया और वक्त को रोक दिया,
खूबसूरती को तस्वीरों में टोक दिया।
खूबसूरती को तस्वीरों में टोक दिया।
50
शब्द कहने से पहले तस्वीर बोल जाती है,
अनकही कहानियों को खोल जाती है।
अनकही कहानियों को खोल जाती है।
51
कैमरा जब मुस्कान पकड़ता है,
हर दिल फिर खिलखिलाता है।
हर दिल फिर खिलखिलाता है।
52
एक क्लिक में सिमट गई दुनिया सारी,
तस्वीरों में बसी रहती है हर धड़कन हमारी।
तस्वीरों में बसी रहती है हर धड़कन हमारी।
53
कैमरे के पीछे जो नजरिया है,
बस वही असली फोटोग्राफिया है।
बस वही असली फोटोग्राफिया है।
54
लेंस से देखो तो हर पल सुनहरा लगे,
कैमरा उठाओ तो हर लम्हा गहरा लगे।
कैमरा उठाओ तो हर लम्हा गहरा लगे।
55
कैमरा आँखों का आईना है,
मेरी हर तस्वीर वाकई एक खजाना है।
मेरी हर तस्वीर वाकई एक खजाना है।
56
तस्वीरें झूठ नहीं बोलती हैं,
लम्हों को सच बना कर खोलती हैं।
लम्हों को सच बना कर खोलती हैं।
57
एक फोटो कहती है हज़ार बातें,
यादों को बना देती है सौगातें।
यादों को बना देती है सौगातें।
58
शटर दबाया और पल को कैद कर लिया,
यादों की किताब में एक और पन्ना भर लिया।
यादों की किताब में एक और पन्ना भर लिया।
59
कैमरा सिर्फ मशीन नहीं,
हर क्लिक में बसी एक तहरीर सही।
हर क्लिक में बसी एक तहरीर सही।
60
लम्हें चले जाते हैं, पर तस्वीरें रह जाती हैं,
वक्त बदलता है, यादें महक जाती हैं।
वक्त बदलता है, यादें महक जाती हैं।
61
खूबसूरती देखने की कला है,
फोटोग्राफी ज़िन्दगी की माला है।
फोटोग्राफी ज़िन्दगी की माला है।
62
जो लफ्ज़ न कह सके वो तस्वीर कहती है,
हर पल की अपनी एक जुबां रहती है।
हर पल की अपनी एक जुबां रहती है।
63
कैमरा नहीं, एक नज़र चाहिए,
हर तस्वीर में हुनर चाहिए।
हर तस्वीर में हुनर चाहिए।
64
शटर दबता है, वक्त ठहर जाता है,
हर तस्वीर में एक ख्वाब सवर जाता है।
हर तस्वीर में एक ख्वाब सवर जाता है।
65
कैमरे के लेंस से देखो ज़रा,
हर तस्वीर में मिलेगा नया आसरा।
हर तस्वीर में मिलेगा नया आसरा।
66
एक फोटो ने बता दिया,
जो दिल कभी न कह पाया।
जो दिल कभी न कह पाया।
67
जो लम्हे बीत गए, उन्हें सहेज लिया,
कैमरे की नजर में फिर से जी लिया।
कैमरे की नजर में फिर से जी लिया।
68
लेंस की नज़र बहुत गहरी होती है,
हर तस्वीर में ज़िन्दगी ठहरी होती है।
हर तस्वीर में ज़िन्दगी ठहरी होती है।
69
तस्वीरों में महकते हैं मेरे अरमान,
हर फोटो में बसी होती है एक जान।
हर फोटो में बसी होती है एक जान।
70
लफ्ज़ों से ज्यादा तस्वीरें बोलती हैं,
ये तो अनकही कहानियाँ खोलती हैं।
ये तो अनकही कहानियाँ खोलती हैं।
71
कैमरा वही देखता है, जो छूट जाता है,
लम्हों को सहेजकर यादों में लाता है।
लम्हों को सहेजकर यादों में लाता है।
72
फोटो में बसी होती हैं सदियों की कहानियाँ,
बस पढ़ने वाला चाहिए जो समझे उनकी जुबानियाँ।
बस पढ़ने वाला चाहिए जो समझे उनकी जुबानियाँ।
73
जो कैमरा देखे वो दुनिया देख नहीं सकती है,
हर तस्वीर अपने अंदर बेइन्तेहाँ बातें रखती हैं।
हर तस्वीर अपने अंदर बेइन्तेहाँ बातें रखती हैं।
74
फोटोग्राफी एक अनकहा एहसास है,
हर तस्वीर में बसी कोई खास बात है।
हर तस्वीर में बसी कोई खास बात है।
75
लम्हों को संभाल कर रखना चाहता हूँ,
इसलिए हर पल को कैमरे में कैद करना चाहता हूँ।
इसलिए हर पल को कैमरे में कैद करना चाहता हूँ।
76
कैमरे का हर क्लिक जादू कर जाता है,
जो भूल चुके थे वो याद आ जाता है।
जो भूल चुके थे वो याद आ जाता है।
77
तस्वीरें नहीं, वक्त का आईना खींचते हैं,
जो गुज़रा नहीं, उसे भी हम सींचते हैं।
जो गुज़रा नहीं, उसे भी हम सींचते हैं।
78
एक तस्वीर हज़ार शब्दों से बेहतर होती है,
हर फोटो में जिंदगी की लकीर होती है।
हर फोटो में जिंदगी की लकीर होती है।
79
लेंस से जो दिखता है वो हकीकत नहीं,
हर तस्वीर में छुपी एक हसरत ही सही।
हर तस्वीर में छुपी एक हसरत ही सही।
80
जो कैद किया तस्वीर में,
वो लम्हा अमर हो गया तक़दीर में।
वो लम्हा अमर हो गया तक़दीर में।
81
हर क्लिक में बसी होती है आत्मा,
हर तस्वीर में संजोई होती है भावना।
हर तस्वीर में संजोई होती है भावना।
82
जो फोटोग्राफी समझता है,
वो जिंदगी को करीब से देखता है।
वो जिंदगी को करीब से देखता है।
83
तस्वीरों में बसी रहती है वो बातें,
जो जुबां कभी कह नहीं पाती।
जो जुबां कभी कह नहीं पाती।
84
जो बीत गया वो तस्वीरों में जीता है,
फोटोग्राफी हर पल को अनमोल बना देता है।
फोटोग्राफी हर पल को अनमोल बना देता है।
85
हर तस्वीर एक हसीन कहानी है,
हर फ्रेम में बसी एक पुरानी निशानी है।
हर फ्रेम में बसी एक पुरानी निशानी है।
86
कैमरे की दुनिया अनोखी होती है,
हर फोटो में कोई कहानी रोशन होती है।
हर फोटो में कोई कहानी रोशन होती है।
87
शटर दबा, तस्वीर बनी,
यादों की किताब में एक शाम लिखी।
यादों की किताब में एक शाम लिखी।
88
हर तस्वीर अपने आप में अनोखी होती है,
हर फ्रेम की अपनी एक रोशनी होती है।
हर फ्रेम की अपनी एक रोशनी होती है।
89
खूबसूरती देखने की कला है फोटोग्राफी,
हर फोटो में छुपी होती एक ज़िन्दगी।
हर फोटो में छुपी होती एक ज़िन्दगी।
90
फोटोग्राफी से वक्त ठहर जाता है,
जो अनदेखा था वो निखर जाता है।
जो अनदेखा था वो निखर जाता है।
91
कैमरे की क्लिक में जादू बसा है,
हर तस्वीर में अनकहा किस्सा छिपा है।
हर तस्वीर में अनकहा किस्सा छिपा है।
92
जो दिखता है वो हमेशा सच नहीं होता,
तस्वीरों के पीछे भी एक वक्त है होता।
तस्वीरों के पीछे भी एक वक्त है होता।
93
फोटोग्राफी सिर्फ एक कला नहीं,
यह एक एहसास है जो कभी मिटता नहीं।
यह एक एहसास है जो कभी मिटता नहीं।
94
हर तस्वीर एक नया सफर है,
हर फ्रेम में एक अनकही दास्तान मगर है।
हर फ्रेम में एक अनकही दास्तान मगर है।
95
कैमरे की नजर सबसे अनोखी होती है,
हर तस्वीर में एक अलग रोशनी होती है।
हर तस्वीर में एक अलग रोशनी होती है।
96
मोबाइल से तस्वीरों में हर रंग बस जाए,
शटर दबाए तो जैसे वक्त ठहर जाए।
शटर दबाए तो जैसे वक्त ठहर जाए।
97
मोबाइल से तस्वीरें खींचते हैं, लेंस के जादू से सूरत बदल जाती है,
हर क्लिक में कुछ खास होता है, हर पल में दुनिया सिमट जाती है।
हर क्लिक में कुछ खास होता है, हर पल में दुनिया सिमट जाती है।
98
मोबाइल का कैमरा नहीं, वो लेंस है जो सपने सच करता है,
हर पल को कैद करके, यादों का खजाना रखता है।
हर पल को कैद करके, यादों का खजाना रखता है।
99
जो आंखों ने देखा, उसे कैमरे ने संभाल लिया,
जो दिल ने महसूस किया, उसे तस्वीर ने उतार लिया।
जो दिल ने महसूस किया, उसे तस्वीर ने उतार लिया।
100
कैमरा आंखों का सहारा बन गया,
हर लम्हा तस्वीर में उतारा बन गया।
हर लम्हा तस्वीर में उतारा बन गया।
101
रोशनी चेहरे पर उतरी तो बात बन गई,
निगाह ठहरी ज़रा-सी तो रात बन गई,
मैं तस्वीर लेने भर को वहाँ रुका था,
वही छोटी-सी घड़ी पूरी याद बन गई।
निगाह ठहरी ज़रा-सी तो रात बन गई,
मैं तस्वीर लेने भर को वहाँ रुका था,
वही छोटी-सी घड़ी पूरी याद बन गई।
102
दूरी वही थी, मगर मंज़र बदल गया,
एक क़दम पीछे हटा तो मतलब बदल गया,
लेंस ने बस इतना-सा फ़ासला रखा था,
जो सामने था, उसे देखने का ढंग बदल गया।
एक क़दम पीछे हटा तो मतलब बदल गया,
लेंस ने बस इतना-सा फ़ासला रखा था,
जो सामने था, उसे देखने का ढंग बदल गया।
103
धूप कड़ी थी, गली लगभग ख़ाली थी,
दीवार पुरानी थी, खिड़की आधी काली थी,
मैं रंग तलाशता रहा देर तक वहाँ,
फिर एक परछाईं मिली, और बस वही काफ़ी थी।
दीवार पुरानी थी, खिड़की आधी काली थी,
मैं रंग तलाशता रहा देर तक वहाँ,
फिर एक परछाईं मिली, और बस वही काफ़ी थी।
104
लेंस पर धूल थी, दिल पर भी थोड़ी थी,
दोनों को साफ़ किया तो राह कुछ और ही थी,
शहर वही, चेहरे वही, मौसम भी वही,
बस देखने की आदत पहले थोड़ी अधूरी थी।
दोनों को साफ़ किया तो राह कुछ और ही थी,
शहर वही, चेहरे वही, मौसम भी वही,
बस देखने की आदत पहले थोड़ी अधूरी थी।
105
हाथ में कैमरा था, दिल में हर मंज़र को रोक लेने की चाह थी,
हर गुज़रते पल पर जैसे मेरी बेचैन निगाह थी।
एक चेहरा आया, बिना तस्वीर बने चुपचाप गुज़र गया,
तब जाना, कुछ यादों का बस गुज़र जाना ही उनकी पनाह थी।।
हर गुज़रते पल पर जैसे मेरी बेचैन निगाह थी।
एक चेहरा आया, बिना तस्वीर बने चुपचाप गुज़र गया,
तब जाना, कुछ यादों का बस गुज़र जाना ही उनकी पनाह थी।।
106
कभी पास जाकर आँखों की नमी मिली,
कभी दूर रहकर पूरी गली मिली,
तस्वीर ने हर बार यही समझाया
फ़ासला बदला तो कहानी नई मिली।
कभी दूर रहकर पूरी गली मिली,
तस्वीर ने हर बार यही समझाया
फ़ासला बदला तो कहानी नई मिली।
107
रात की धीमी रौशनी में बात पूरी हो गई,
सूनी सड़क, ठहरी हवा, कुछ दूरी हो गई।
मैंने अँधेरे से उजाले की ज़िद जब छोड़ दी,
तब तस्वीर अपनी ख़ामोशी में पूरी हो गई।
सूनी सड़क, ठहरी हवा, कुछ दूरी हो गई।
मैंने अँधेरे से उजाले की ज़िद जब छोड़ दी,
तब तस्वीर अपनी ख़ामोशी में पूरी हो गई।
108
फ़्रेम में जितना ठहरा, उतना ही जहाँ नहीं,
जो हाशिये में रह गया, वह भी बेनिशाँ नहीं।
कैमरा बस एक नज़र चुनता है, सारी दुनिया नहीं,
हर आँख का अपना सच है, कोई नज़र पूरा आसमाँ नहीं।
जो हाशिये में रह गया, वह भी बेनिशाँ नहीं।
कैमरा बस एक नज़र चुनता है, सारी दुनिया नहीं,
हर आँख का अपना सच है, कोई नज़र पूरा आसमाँ नहीं।
109
धुंध ने पहाड़ आधा छुपा रखा था,
मैंने साफ़ मौसम का सपना सजा रखा था,
फिर उसी अधूरे मंज़र पर दिल ठहर गया,
शायद ख़ूबसूरती ने परदा लगा रखा था।
मैंने साफ़ मौसम का सपना सजा रखा था,
फिर उसी अधूरे मंज़र पर दिल ठहर गया,
शायद ख़ूबसूरती ने परदा लगा रखा था।
110
शटर दबा और हँसी थोड़ी बदल गई,
आँखों की हल्की-सी बात सामने निकल गई,
मैंने चेहरा देखा था, कैमरे ने कुछ और देखा,
एक छोटी-सी ख़ामोशी तस्वीर में ढल गई।
आँखों की हल्की-सी बात सामने निकल गई,
मैंने चेहरा देखा था, कैमरे ने कुछ और देखा,
एक छोटी-सी ख़ामोशी तस्वीर में ढल गई।
111
कैमरे की हर गवाही को सच्चाई समझना ठीक नहीं,
हर चमक के पीछे पूरा उजाला हो, ज़रूरी नहीं।
निगाह साफ़ हो तो साधारण मंज़र भी दिल में उतर जाता है,
वरना हुस्न सामने हो, फिर भी असर हो, ज़रूरी नहीं।।
हर चमक के पीछे पूरा उजाला हो, ज़रूरी नहीं।
निगाह साफ़ हो तो साधारण मंज़र भी दिल में उतर जाता है,
वरना हुस्न सामने हो, फिर भी असर हो, ज़रूरी नहीं।।
112
काँच पर बारिश की एक बूँद ठहरी थी,
पीछे शहर की रोशनी थोड़ी बिखरी थी,
हाथ बढ़ा उसे पोंछने, फिर रुक गया,
उसी छोटी कमी में तस्वीर कुछ ज़्यादा निखरी थी।
पीछे शहर की रोशनी थोड़ी बिखरी थी,
हाथ बढ़ा उसे पोंछने, फिर रुक गया,
उसी छोटी कमी में तस्वीर कुछ ज़्यादा निखरी थी।
113
आधा चेहरा रोशनी में, आधा ठहरा साये में,
एक ख़ामोश कहानी थी आँखों की गहराई में।
हर बात का खुल जाना भी कहाँ ज़रूरी होता है,
कुछ राज़ ही तो साँस लेते हैं तस्वीर की तन्हाई में।
एक ख़ामोश कहानी थी आँखों की गहराई में।
हर बात का खुल जाना भी कहाँ ज़रूरी होता है,
कुछ राज़ ही तो साँस लेते हैं तस्वीर की तन्हाई में।
114
लेंस ने दूरी दी, दिल ने पास रखा,
चेहरे को नहीं, उसके एहसास को ख़ास रखा,
तस्वीर बाद में देखी तो बात समझ आई,
मैंने उसे कम, अपने देखने को ज़्यादा परखा।
चेहरे को नहीं, उसके एहसास को ख़ास रखा,
तस्वीर बाद में देखी तो बात समझ आई,
मैंने उसे कम, अपने देखने को ज़्यादा परखा।
115
छोटे से लेंस में पूरा आसमान उतर आया,
एक खिड़की से चुपचाप सारा जहाँ नज़र आया।
तब जाना, दायरा चीज़ों का होता है, निगाहों का नहीं,
नज़र सच्ची हो तो थोड़े में भी एक जहाँ समाया।
एक खिड़की से चुपचाप सारा जहाँ नज़र आया।
तब जाना, दायरा चीज़ों का होता है, निगाहों का नहीं,
नज़र सच्ची हो तो थोड़े में भी एक जहाँ समाया।
116
सूनी दीवार थी, रंग उसके उतरते रहे,
कितने मौसम उसकी देहरी से गुज़रते रहे।
धूल में कुछ कदमों के निशान ठहरे थे,
जैसे लोग आए, कुछ पल रुके, फिर बिछड़ते रहे।
कितने मौसम उसकी देहरी से गुज़रते रहे।
धूल में कुछ कदमों के निशान ठहरे थे,
जैसे लोग आए, कुछ पल रुके, फिर बिछड़ते रहे।
117
रंग भरपूर थे, फिर भी तस्वीर में सन्नाटा रह गया,
हँसी चेहरे पर ठहरी, आँखों में एक सवाल रह गया,
चेहरा साफ़ था, मगर दिल तक उसकी धड़कन न गई,
तब जाना, तस्वीर पूरी तब हुई, जब उसमें रूह उतर गई।
हँसी चेहरे पर ठहरी, आँखों में एक सवाल रह गया,
चेहरा साफ़ था, मगर दिल तक उसकी धड़कन न गई,
तब जाना, तस्वीर पूरी तब हुई, जब उसमें रूह उतर गई।
118
खिड़की छोटी थी, बाहर लंबी शाम थी,
अंदर चुप्पी, बाहर शहर की आवाज़ आम थी,
मैंने बस उस एक कोने को रहने दिया,
कम दिखा, मगर तस्वीर में पूरी शाम थी।
अंदर चुप्पी, बाहर शहर की आवाज़ आम थी,
मैंने बस उस एक कोने को रहने दिया,
कम दिखा, मगर तस्वीर में पूरी शाम थी।
119
तस्वीर से पहले साँस कुछ यूँ ठहर गई,
रोशनी की महीन धार आँखों में उतर गई।
वह पल आया, छुआ, और ख़ामोशी में गुज़र गया,
तब जाना, एक उम्र से निगाह उसी राह पर ठहर गई।
रोशनी की महीन धार आँखों में उतर गई।
वह पल आया, छुआ, और ख़ामोशी में गुज़र गया,
तब जाना, एक उम्र से निगाह उसी राह पर ठहर गई।
120
कैमरे बदले, लेंस बदले, राहें कुछ आसान हुईं,
रंग निखरे, धूप सँवरी, शामें भी मेहरबान हुईं।
पर तस्वीर की रूह का रिश्ता अब भी नज़र से ही है,
वो पहले आँख में जन्मी, फिर कैमरे की जान हुई।
रंग निखरे, धूप सँवरी, शामें भी मेहरबान हुईं।
पर तस्वीर की रूह का रिश्ता अब भी नज़र से ही है,
वो पहले आँख में जन्मी, फिर कैमरे की जान हुई।
121
पुरानी तस्वीर खोली तो घर में वही ख़ुशबू उतर आई,
बीते मौसम की कोई शाम फिर चुपके से लौट आई।
चेहरे वही थे, हम ही न जाने कब इतने बदल गए,
काग़ज़ चुप रहा, मगर आँखों में पूरी उम्र भर आई।
बीते मौसम की कोई शाम फिर चुपके से लौट आई।
चेहरे वही थे, हम ही न जाने कब इतने बदल गए,
काग़ज़ चुप रहा, मगर आँखों में पूरी उम्र भर आई।
122
कुछ तस्वीरें तारीख़ नहीं, गुज़रा मौसम बताती हैं,
छूते ही बीते दिनों की आहट फिर जगाती हैं।
किसी की हँसी, किसी की अधूरी-सी बात,
बस इतना याद आए, तो आँखें ख़ुद भीग जाती हैं।
छूते ही बीते दिनों की आहट फिर जगाती हैं।
किसी की हँसी, किसी की अधूरी-सी बात,
बस इतना याद आए, तो आँखें ख़ुद भीग जाती हैं।
123
माँ की वह तस्वीर आज भी वहीं ठहरी है,
होंठों पर हल्की हँसी, आँखों में नरमी गहरी है।
उम्र मेरी चाहे कितनी दूर समय के संग बह जाए,
उस एक चेहरे में मेरी सारी दुनिया अब भी ठहरी है।
होंठों पर हल्की हँसी, आँखों में नरमी गहरी है।
उम्र मेरी चाहे कितनी दूर समय के संग बह जाए,
उस एक चेहरे में मेरी सारी दुनिया अब भी ठहरी है।
124
जिस दिन को हमने साधारण समझा था,
उसी दिन ने बरसों बाद हाथ पकड़ा था,
तस्वीर देखी तो हँसी अपने आप आ गई,
वक़्त ने चुपचाप ख़ज़ाना रख छोड़ा था।
उसी दिन ने बरसों बाद हाथ पकड़ा था,
तस्वीर देखी तो हँसी अपने आप आ गई,
वक़्त ने चुपचाप ख़ज़ाना रख छोड़ा था।
125
एक खाली कुर्सी तस्वीर में भरी हुई है,
उस पर बैठी याद अब भी खड़ी हुई है,
घर ने बहुत कुछ बदल लिया इन सालों में,
बस एक पुरानी मुस्कान वहीं पड़ी हुई है।
उस पर बैठी याद अब भी खड़ी हुई है,
घर ने बहुत कुछ बदल लिया इन सालों में,
बस एक पुरानी मुस्कान वहीं पड़ी हुई है।
126
नाम धुँधले हैं, चेहरे भी अब पूरे याद नहीं,
पर उस दिन की हवा की नरमी अब तक गई नहीं।
यादें कहाँ हर बात का मुकम्मल हिसाब रखती हैं,
कभी एक ख़ुशबू उठती है, और वही मौसम लौट आता है।
पर उस दिन की हवा की नरमी अब तक गई नहीं।
यादें कहाँ हर बात का मुकम्मल हिसाब रखती हैं,
कभी एक ख़ुशबू उठती है, और वही मौसम लौट आता है।
127
हम जल्दी में थे, शाम निकल गई,
बात छोटी थी, हँसी यूँ ही मचल गई,
तस्वीर तब बस तस्वीर लगी थी हमें,
बरसों बाद वही सबसे कीमती निकल गई।
बात छोटी थी, हँसी यूँ ही मचल गई,
तस्वीर तब बस तस्वीर लगी थी हमें,
बरसों बाद वही सबसे कीमती निकल गई।
128
पुराना बक्सा खुला तो मौसम खुल गए,
कुछ चेहरे पास आए, कुछ सवाल मिल गए,
हम समझते थे बीते दिन बहुत पीछे हैं,
एक तस्वीर मिली, और सारे फ़ासले घुल गए।
कुछ चेहरे पास आए, कुछ सवाल मिल गए,
हम समझते थे बीते दिन बहुत पीछे हैं,
एक तस्वीर मिली, और सारे फ़ासले घुल गए।
129
घर बदला, शहर बदला, जीने के तौर बदल गए,
कुछ रास्ते पीछे छूटे, कुछ किस्से दिल में पल गए,
अलमारी में चुप थी वही एक तस्वीर बरसों से,
उसे देखा तो उम्रों से बिछड़े हम फिर मिल गए।
कुछ रास्ते पीछे छूटे, कुछ किस्से दिल में पल गए,
अलमारी में चुप थी वही एक तस्वीर बरसों से,
उसे देखा तो उम्रों से बिछड़े हम फिर मिल गए।
130
एक मेज़ के चारों ओर सब साथ थे,
तब मिलने के लिए कहाँ इतने हिसाब थे,
आज तारीख़ देखकर मुलाक़ात तय होती है,
उस तस्वीर में दिन कितने बेहिसाब थे।
तब मिलने के लिए कहाँ इतने हिसाब थे,
आज तारीख़ देखकर मुलाक़ात तय होती है,
उस तस्वीर में दिन कितने बेहिसाब थे।
131
तस्वीरें बोलती नहीं, फिर भी सुनाई देती हैं,
पुरानी बातें धीरे-धीरे याद दिलाती हैं,
जो बातें तब मामूली लगती थीं हमें,
उम्र बढ़े तो वही सबसे ज़्यादा सताती हैं।
पुरानी बातें धीरे-धीरे याद दिलाती हैं,
जो बातें तब मामूली लगती थीं हमें,
उम्र बढ़े तो वही सबसे ज़्यादा सताती हैं।
132
कभी हँसी की लौ जली, कभी नमी पलकों पर ठहर गई,
एक पुरानी तस्वीर से वह शाम फिर कमरे में उतर गई।
वक़्त पलटकर आता नहीं, यह बात दिल ने मान भी ली,
फिर भी उसकी धूप न जाने कैसे हथेली तक बिखर गई।
एक पुरानी तस्वीर से वह शाम फिर कमरे में उतर गई।
वक़्त पलटकर आता नहीं, यह बात दिल ने मान भी ली,
फिर भी उसकी धूप न जाने कैसे हथेली तक बिखर गई।
133
वह कमरा अब वैसा नहीं, दीवारों का मौसम बदल गया,
वह दरवाज़ा भी शायद नहीं, जहाँ एक पूरा घर पल गया।
तस्वीर ने वक़्त से कुछ माँगा नहीं, बस चुपचाप वहीं रही,
सब कुछ आगे निकल गया, एक बीता हुआ पल वहीं रह गया।
वह दरवाज़ा भी शायद नहीं, जहाँ एक पूरा घर पल गया।
तस्वीर ने वक़्त से कुछ माँगा नहीं, बस चुपचाप वहीं रही,
सब कुछ आगे निकल गया, एक बीता हुआ पल वहीं रह गया।
134
बालों में धूप थी, आँखों में दोपहर,
पीछे छोटा-सा घर, सामने लंबा सफ़र,
तब बस यूँ ही खींची थी वह तस्वीर,
आज देखो तो उसमें बसा है पूरा एक शहर।
पीछे छोटा-सा घर, सामने लंबा सफ़र,
तब बस यूँ ही खींची थी वह तस्वीर,
आज देखो तो उसमें बसा है पूरा एक शहर।
135
कुछ तस्वीरें देखने से ज़्यादा सँभालने की होती हैं,
कुछ यादें कहने से ज़्यादा निभाने की होती हैं,
जब ज़िंदगी बहुत तेज़ भागने लगे,
वही पुरानी तस्वीरें हमें घर लाने की होती हैं।
कुछ यादें कहने से ज़्यादा निभाने की होती हैं,
जब ज़िंदगी बहुत तेज़ भागने लगे,
वही पुरानी तस्वीरें हमें घर लाने की होती हैं।
136
बरसों बाद अपना ही चेहरा अजनबी लगा,
वही हँसी थी, मगर आदमी कुछ और लगा,
तस्वीर से पूछा—इतना कब बदल गया मैं?
वह चुप रही, और यही जवाब सही लगा।
वही हँसी थी, मगर आदमी कुछ और लगा,
तस्वीर से पूछा—इतना कब बदल गया मैं?
वह चुप रही, और यही जवाब सही लगा।
137
रंग हल्के पड़े, काग़ज़ थोड़ा पुराना हुआ,
पर याद का रिश्ता और सुहाना हुआ,
वक़्त तस्वीर की चमक कम कर सकता है,
दिल में रखा चेहरा कहाँ पुराना हुआ।
पर याद का रिश्ता और सुहाना हुआ,
वक़्त तस्वीर की चमक कम कर सकता है,
दिल में रखा चेहरा कहाँ पुराना हुआ।
138
हम कहते रहे, फिर मिलेंगे, अभी किस बात की जल्दी है,
ज़िंदगी हँसकर गुज़र गई, उसकी अपनी ही घड़ी है।
अब हर मुलाक़ात को तस्वीर में सँभाल लेता हूँ,
कौन जाने किस हँसी पर वक़्त की आख़िरी मुहर पड़ी है।
ज़िंदगी हँसकर गुज़र गई, उसकी अपनी ही घड़ी है।
अब हर मुलाक़ात को तस्वीर में सँभाल लेता हूँ,
कौन जाने किस हँसी पर वक़्त की आख़िरी मुहर पड़ी है।
139
जिस पल में थे, उसे थामने की फ़ुर्सत कहाँ थी,
अब वही घड़ी हर ख़ामोशी में कहीं ठहरी-सी थी।
तस्वीर ने बरसों बाद धीरे से इतना कहा,
जिसे मामूली समझकर जी गए, वही असली दौलत थी।
अब वही घड़ी हर ख़ामोशी में कहीं ठहरी-सी थी।
तस्वीर ने बरसों बाद धीरे से इतना कहा,
जिसे मामूली समझकर जी गए, वही असली दौलत थी।
140
हर याद मरहम बन जाए, ये ज़रूरी तो नहीं,
कुछ तस्वीरें चुभती हैं, मगर बुरी तो नहीं।
जो अपना था, उसकी निशानी मिटा देना आसान है,
दिल से भी मिट जाए वही, ऐसी मजबूरी तो नहीं।
कुछ तस्वीरें चुभती हैं, मगर बुरी तो नहीं।
जो अपना था, उसकी निशानी मिटा देना आसान है,
दिल से भी मिट जाए वही, ऐसी मजबूरी तो नहीं।
141
सबकी निगाह सामने के मंज़र पर ठहरी थी,
उसकी नज़र किनारों की ख़ामोशी पढ़ रही थी।
लोगों ने पूछा, “यहाँ तस्वीर आखिर है कहाँ?”
वह मुस्कुराया, “जो नज़र से छूट गया, मेरी तलाश बस वहीं थी।”
उसकी नज़र किनारों की ख़ामोशी पढ़ रही थी।
लोगों ने पूछा, “यहाँ तस्वीर आखिर है कहाँ?”
वह मुस्कुराया, “जो नज़र से छूट गया, मेरी तलाश बस वहीं थी।”
142
रोशनी अभी अधूरी है, कहकर वह वहीं ठहर गया,
काफ़िला धूल की राहों में धीरे धीरे गुज़र गया।
जब धूप ने चेहरे पर अपना सुनहरा हाथ रखा,
सब्र की छाँव में पलता हुनर उस पल निखर गया।
काफ़िला धूल की राहों में धीरे धीरे गुज़र गया।
जब धूप ने चेहरे पर अपना सुनहरा हाथ रखा,
सब्र की छाँव में पलता हुनर उस पल निखर गया।
143
टूटी दीवार, बूढ़े हाथ, सूना पड़ा दरवाज़ा,
हर ख़ामोशी में उसे मिलता कोई भूला सा इशारा।
लोग कहते रहे, यहाँ आख़िर देखने जैसा क्या है,
वह वहीं से चुन लाता था ज़िंदगी का सच्चा क़िस्सा सारा।
हर ख़ामोशी में उसे मिलता कोई भूला सा इशारा।
लोग कहते रहे, यहाँ आख़िर देखने जैसा क्या है,
वह वहीं से चुन लाता था ज़िंदगी का सच्चा क़िस्सा सारा।
144
वह सुंदर चेहरा नहीं, सच्चा भाव देखता है,
हँसी में छुपा थोड़ा-सा ठहराव देखता है,
सजावट बहुत कुछ बदल सकती है चेहरे पर,
फोटोग्राफर आँखों में असली स्वभाव देखता है।
हँसी में छुपा थोड़ा-सा ठहराव देखता है,
सजावट बहुत कुछ बदल सकती है चेहरे पर,
फोटोग्राफर आँखों में असली स्वभाव देखता है।
145
कभी तस्वीर नहीं बनी तो भी क्या हुआ,
सुबह देखी, हवा सुनी, रास्ता तो छुआ,
हर ख़ूबसूरत पल को क़ैद करना ज़रूरी नहीं,
कुछ यादें कैमरे से बाहर रहें तो भी क्या हुआ।
सुबह देखी, हवा सुनी, रास्ता तो छुआ,
हर ख़ूबसूरत पल को क़ैद करना ज़रूरी नहीं,
कुछ यादें कैमरे से बाहर रहें तो भी क्या हुआ।
146
दस तस्वीरें मिटाकर एक निशानी रखता है,
अपनी ही नज़र को हर दफ़ा फिर परखता है।
हुनर हर मंज़र को दुनिया के आगे रखना नहीं,
कभी कम में ही पूरा एक जहाँ बोल उठता है।
अपनी ही नज़र को हर दफ़ा फिर परखता है।
हुनर हर मंज़र को दुनिया के आगे रखना नहीं,
कभी कम में ही पूरा एक जहाँ बोल उठता है।
147
बारिश मिली तो भीगी राह से शिकवा न किया,
धूप ने तपाया तो सफ़र से किनारा न किया।
जो रंग मिला मौसम से, उसी में तस्वीर सँवरती रही,
हुनर था, मगर मंज़र पर अपना दावा न किया।
धूप ने तपाया तो सफ़र से किनारा न किया।
जो रंग मिला मौसम से, उसी में तस्वीर सँवरती रही,
हुनर था, मगर मंज़र पर अपना दावा न किया।
148
कपड़ों पर धूल, घुटनों पर मिट्टी लगी थी,
एक छोटे-से पल पर उसकी नज़र टिकी थी,
किसी ने पूछा—इतनी मेहनत क्यों एक तस्वीर पर?
वह हँसा, बोला, यही तो बात है, जो सबको नहीं दिखी थी।
एक छोटे-से पल पर उसकी नज़र टिकी थी,
किसी ने पूछा—इतनी मेहनत क्यों एक तस्वीर पर?
वह हँसा, बोला, यही तो बात है, जो सबको नहीं दिखी थी।
149
चेहरा ख़ूबसूरत था, मगर उसकी रज़ा शामिल न थी,
नज़र ठहरी ज़रा, तस्वीर की इजाज़त हासिल न थी।
हुनर हर हुस्न को अपने फ़्रेम में भर लेना नहीं,
कभी कैमरा झुका देना भी इंसानियत से कम नहीं।
नज़र ठहरी ज़रा, तस्वीर की इजाज़त हासिल न थी।
हुनर हर हुस्न को अपने फ़्रेम में भर लेना नहीं,
कभी कैमरा झुका देना भी इंसानियत से कम नहीं।
150
कभी खाली हाथ लौटना भी सफ़र की हार नहीं,
हर सुबह रोशनी मेहरबान हो, ऐसा कोई करार नहीं।
जो मायूसी साथ लिए भी अगली भोर फिर राह चुन ले,
तस्वीरों से सच्ची मोहब्बत उसी की है, जिसे हासिल की दरकार नहीं।
हर सुबह रोशनी मेहरबान हो, ऐसा कोई करार नहीं।
जो मायूसी साथ लिए भी अगली भोर फिर राह चुन ले,
तस्वीरों से सच्ची मोहब्बत उसी की है, जिसे हासिल की दरकार नहीं।
151
उसने झुर्रियों में गुज़रे मौसमों का निशान रहने दिया,
थकी आँखों में ढलती शाम का आसमान रहने दिया,
तस्वीर ख़ूबसूरत थी क्योंकि कुछ भी छुपाया नहीं गया,
उसने ज़िंदगी को ज़िंदगी का ही बयान रहने दिया।
थकी आँखों में ढलती शाम का आसमान रहने दिया,
तस्वीर ख़ूबसूरत थी क्योंकि कुछ भी छुपाया नहीं गया,
उसने ज़िंदगी को ज़िंदगी का ही बयान रहने दिया।
152
भीड़ में होकर भी उसका रास्ता थोड़ा अलग रहता है,
जहाँ सब गुज़र जाते हैं, उसका दिल वहीं ठहरता है।
लोग सिर्फ़ मंज़र देखते हैं, वह उसकी ख़ामोशी सुन लेता है,
कभी तस्वीर ख़ुद उसे चुनती है, वह बस उसके साथ चल देता है।
जहाँ सब गुज़र जाते हैं, उसका दिल वहीं ठहरता है।
लोग सिर्फ़ मंज़र देखते हैं, वह उसकी ख़ामोशी सुन लेता है,
कभी तस्वीर ख़ुद उसे चुनती है, वह बस उसके साथ चल देता है।
153
महँगा कैमरा होना पहचान नहीं होती,
साफ़ निगाह से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती,
सामान आज नया है, कल पुराना हो जाएगा,
देखने की आदत कभी बेकार नहीं होती।
साफ़ निगाह से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती,
सामान आज नया है, कल पुराना हो जाएगा,
देखने की आदत कभी बेकार नहीं होती।
154
बच्चे की हँसी को उसने फीका पड़ने नहीं दिया,
बूढ़ी आँखों पर झूठा उजाला चढ़ने नहीं दिया,
जो जैसा था, उसे वैसा ही ठहरने दिया,
तस्वीर ली, मगर सच को बदलने नहीं दिया।
बूढ़ी आँखों पर झूठा उजाला चढ़ने नहीं दिया,
जो जैसा था, उसे वैसा ही ठहरने दिया,
तस्वीर ली, मगर सच को बदलने नहीं दिया।
155
तालियों की गूँज पीछे छूटती रही कहीं,
नाम बढ़ता गया, दिल में गुरूर आया नहीं।
भोर ने फिर रोशनी रख दी उसके रास्ते पर,
वह चल पड़ा मगर हुनर ने कभी अपना हिसाब रखा नहीं।
नाम बढ़ता गया, दिल में गुरूर आया नहीं।
भोर ने फिर रोशनी रख दी उसके रास्ते पर,
वह चल पड़ा मगर हुनर ने कभी अपना हिसाब रखा नहीं।
156
पक्षी पल भर आया, फिर आसमान हो गया,
वह घंटों बैठा रहा, तब वह अरमान हो गया,
तस्वीर बस एक पल की थी, यह सच है,
मगर उसके पीछे पूरा सवेरा कुर्बान हो गया।
वह घंटों बैठा रहा, तब वह अरमान हो गया,
तस्वीर बस एक पल की थी, यह सच है,
मगर उसके पीछे पूरा सवेरा कुर्बान हो गया।
157
तस्वीर साफ़ थी, मगर दिल तक नहीं गई,
एक दूसरी थोड़ी धुँधली थी, मगर भूल नहीं गई,
तकनीक ज़रूरी है, इसमें दो राय कहाँ,
पर सिर्फ़ सफ़ाई से हर तस्वीर खूबसूरत नहीं हुई।
एक दूसरी थोड़ी धुँधली थी, मगर भूल नहीं गई,
तकनीक ज़रूरी है, इसमें दो राय कहाँ,
पर सिर्फ़ सफ़ाई से हर तस्वीर खूबसूरत नहीं हुई।
158
वह मंज़र को अपने हिसाब से मोड़ता नहीं,
हर बार रोशनी को पकड़कर तोड़ता नहीं,
पहले देखता है कि सामने क्या कह रहा है,
फिर कैमरा उठाता है, जल्दी में जोड़ता नहीं।
हर बार रोशनी को पकड़कर तोड़ता नहीं,
पहले देखता है कि सामने क्या कह रहा है,
फिर कैमरा उठाता है, जल्दी में जोड़ता नहीं।
159
सुबह उसके लिए सिर्फ़ सूरज नहीं होती,
रात उसके लिए बस अँधेरी नहीं होती,
हर बदलती रोशनी का अपना मिज़ाज है,
फोटोग्राफर की नज़र कभी एक जैसी नहीं होती।
रात उसके लिए बस अँधेरी नहीं होती,
हर बदलती रोशनी का अपना मिज़ाज है,
फोटोग्राफर की नज़र कभी एक जैसी नहीं होती।
160
तस्वीर बनाकर पहला सवाल ख़ुद से करता है,
क्या इसमें सच है, या बस सुंदर लगता है?
जो अपनी कमी देख सके हर अच्छी तस्वीर में,
वही धीरे-धीरे सच में बेहतर बनता है।
क्या इसमें सच है, या बस सुंदर लगता है?
जो अपनी कमी देख सके हर अच्छी तस्वीर में,
वही धीरे-धीरे सच में बेहतर बनता है।
161
खिड़की के पार खेत धीरे धीरे पीछे छूटते रहे,
हम चुप रहे, भीतर कई रास्ते खुलते रहे।
टिकट पर मंज़िल का पता बिल्कुल साफ़ दर्ज़ था,
पर असली सफ़र भीतर था, जो चुपचाप चलता रहा।
हम चुप रहे, भीतर कई रास्ते खुलते रहे।
टिकट पर मंज़िल का पता बिल्कुल साफ़ दर्ज़ था,
पर असली सफ़र भीतर था, जो चुपचाप चलता रहा।
162
पहाड़ सामने था, हाथों में कैमरा ठहरा रहा,
हवा अपनी धुन में थी, मैं चुप उसे सुनता रहा।
तस्वीर तो आख़िर उस मंज़र की ले ली मैंने,
मगर उससे पहले वह पल मुझमें उतरता रहा।
हवा अपनी धुन में थी, मैं चुप उसे सुनता रहा।
तस्वीर तो आख़िर उस मंज़र की ले ली मैंने,
मगर उससे पहले वह पल मुझमें उतरता रहा।
163
बारिश ने राह मोड़ी, सारे नक़्शे धुल गए,
धुंध उतरी तो कई तयशुदा मंज़र छूट गए।
जिस दिन सफ़र ने एक भी बात हमारी न मानी,
उसी दिन राह ने चुपके से अपनी सबसे खूबसूरत कहानी दी।
धुंध उतरी तो कई तयशुदा मंज़र छूट गए।
जिस दिन सफ़र ने एक भी बात हमारी न मानी,
उसी दिन राह ने चुपके से अपनी सबसे खूबसूरत कहानी दी।
164
बरसती हुई शाम थी, चाय की छोटी-सी दुकान,
कप की भाप में धुँधला रहा सड़क का शोर।
न कोई मशहूर जगह थी, न कोई यादगार निशान,
फिर भी आज तक दिल वहीं ढूँढ़ता है अपनी ठौर।
कप की भाप में धुँधला रहा सड़क का शोर।
न कोई मशहूर जगह थी, न कोई यादगार निशान,
फिर भी आज तक दिल वहीं ढूँढ़ता है अपनी ठौर।
165
रेल की खिड़की पर माथा टिकाए बैठे थे,
शहर पीछे जाते रहे, हम ख़ुद से मिलते थे,
बाहर तस्वीरें बदलती रहीं हर थोड़ी देर में,
अंदर कितने पुराने रास्ते धीरे-धीरे खुलते थे।
शहर पीछे जाते रहे, हम ख़ुद से मिलते थे,
बाहर तस्वीरें बदलती रहीं हर थोड़ी देर में,
अंदर कितने पुराने रास्ते धीरे-धीरे खुलते थे।
166
अजनबी शहर की पहली सुबह नरम थी,
गलियों में चाय और मिट्टी की मिली-जुली ख़ुशबू थी,
न नक्शे ने बताया, न मंसूबे ने लिखा,
जो तस्वीर सबसे प्यारी बनी, वह भटकते हुए मिली थी।
गलियों में चाय और मिट्टी की मिली-जुली ख़ुशबू थी,
न नक्शे ने बताया, न मंसूबे ने लिखा,
जो तस्वीर सबसे प्यारी बनी, वह भटकते हुए मिली थी।
167
रास्ता लंबा था, चेहरे पर थकान भी थी,
मंज़िल सुंदर थी, मगर राह की अपनी जान भी थी,
तस्वीर में बस मुस्कान दिखी लौटकर,
उस मुस्कान के पीछे पूरी चढ़ाई की पहचान भी थी।
मंज़िल सुंदर थी, मगर राह की अपनी जान भी थी,
तस्वीर में बस मुस्कान दिखी लौटकर,
उस मुस्कान के पीछे पूरी चढ़ाई की पहचान भी थी।
168
समुद्र के सामने कैमरा छोटा लगने लगा,
लहरों का शोर तस्वीर से बड़ा लगने लगा,
कुछ मंज़र पूरे उतरते कहाँ हैं किसी दायरे में,
उस दिन अधूरा रखना ही बेहतर लगने लगा।
लहरों का शोर तस्वीर से बड़ा लगने लगा,
कुछ मंज़र पूरे उतरते कहाँ हैं किसी दायरे में,
उस दिन अधूरा रखना ही बेहतर लगने लगा।
169
मंदिर की सीढ़ियों पर सुबह धीरे खुली,
घंटी की आवाज़ हवा में हल्की-सी घुली,
तस्वीर में रंग तो आ गए सारे,
पर आधी याद उस आवाज़ में ही मिली।
घंटी की आवाज़ हवा में हल्की-सी घुली,
तस्वीर में रंग तो आ गए सारे,
पर आधी याद उस आवाज़ में ही मिली।
170
रेत पर शाम थी, सूरज नीचे जाता रहा,
हर साया लंबा होकर रास्ता बनाता रहा,
मैं तस्वीरें लेता रहा चुपचाप वहाँ,
और दिन बिना शिकायत रात में समाता रहा।
हर साया लंबा होकर रास्ता बनाता रहा,
मैं तस्वीरें लेता रहा चुपचाप वहाँ,
और दिन बिना शिकायत रात में समाता रहा।
171
पहाड़ी मोड़ पर बस कुछ देर यूँ ही ठहरी,
नीचे घाटी साँस लेती थी, बादलों की छाया गहरी।
सबको मंज़िल की जल्दी थी, मैं खिड़की से चुप देखता रहा,
उस छोटे से ठहराव में पूरा सफ़र मुझमें उतरता रहा।
नीचे घाटी साँस लेती थी, बादलों की छाया गहरी।
सबको मंज़िल की जल्दी थी, मैं खिड़की से चुप देखता रहा,
उस छोटे से ठहराव में पूरा सफ़र मुझमें उतरता रहा।
172
सड़क किनारे बच्चा पतंग थामे खड़ा था,
पीछे धूल का रास्ता दूर तक पड़ा था,
मंज़िल मेरी कहीं और पुकारती रही उस दिन,
मगर तस्वीर का दिल उसी मोड़ पर अड़ा था।
पीछे धूल का रास्ता दूर तक पड़ा था,
मंज़िल मेरी कहीं और पुकारती रही उस दिन,
मगर तस्वीर का दिल उसी मोड़ पर अड़ा था।
173
होटल की उस बालकनी पर धूप रोज़ मेहरबान कहाँ थी,
कभी बादल थे, कभी सुबह में वह पहली-सी जान कहाँ थी।
फिर एक दिन चाय की भाप में चुपके-सा उजाला उतर आया,
और वही सादी-सी सुबह दिल को सबसे ज़्यादा अपनी लगी।
कभी बादल थे, कभी सुबह में वह पहली-सी जान कहाँ थी।
फिर एक दिन चाय की भाप में चुपके-सा उजाला उतर आया,
और वही सादी-सी सुबह दिल को सबसे ज़्यादा अपनी लगी।
174
पहली दफ़ा शहर मिला तो हर मोड़ अजनबी था,
दूसरी दफ़ा वही रास्ता जैसे बरसों से अपना था।
दोनों सफ़रों की तस्वीरों ने चुपके से इतना कहा,
शहर वही था, बस देखने वाला पहले सा कहाँ था।
दूसरी दफ़ा वही रास्ता जैसे बरसों से अपना था।
दोनों सफ़रों की तस्वीरों ने चुपके से इतना कहा,
शहर वही था, बस देखने वाला पहले सा कहाँ था।
175
सफ़र की हर तस्वीर खूबसूरत हो, ज़रूरी तो नहीं,
हर राह आसान मिले, ये भी कोई मजबूरी तो नहीं।
कुछ गर्द, कुछ थकन, कुछ मोड़ यादों में रहने दो,
यही तो कहते हैं कि ये दास्ताँ अधूरी तो नहीं।।
हर राह आसान मिले, ये भी कोई मजबूरी तो नहीं।
कुछ गर्द, कुछ थकन, कुछ मोड़ यादों में रहने दो,
यही तो कहते हैं कि ये दास्ताँ अधूरी तो नहीं।।
176
ढाबे की मेज़ पर नक्शा खुला रह गया,
चाय ठंडी हुई, रास्ता फिर बदल गया,
हम मंज़िल कम, बातचीत ज़्यादा याद रखते हैं,
शायद सफ़र वहीं थोड़ा घर बन गया।
चाय ठंडी हुई, रास्ता फिर बदल गया,
हम मंज़िल कम, बातचीत ज़्यादा याद रखते हैं,
शायद सफ़र वहीं थोड़ा घर बन गया।
177
भोर हुई, सूर्योदय की चाह लिए हम चल पड़े,
बादल ऐसे घिर आए, आकाश के सारे रंग ढल पड़े।
लौटे तो गाँव की गली में बच्चों की हँसी मिली,
सूरज आँखों से छूटा, पर मन को नई रोशनी मिली।
बादल ऐसे घिर आए, आकाश के सारे रंग ढल पड़े।
लौटे तो गाँव की गली में बच्चों की हँसी मिली,
सूरज आँखों से छूटा, पर मन को नई रोशनी मिली।
178
एक पुराना पुल था, नीचे बहता निर्मल पानी,
हवा छूकर कहती थी कोई भूली-सी कहानी।
तस्वीर लेकर आगे बढ़ा, राह फिर चलती रही,
पर उस जगह की नीरवता मन में देर तक पलती रही।
हवा छूकर कहती थी कोई भूली-सी कहानी।
तस्वीर लेकर आगे बढ़ा, राह फिर चलती रही,
पर उस जगह की नीरवता मन में देर तक पलती रही।
179
मंज़िल की तस्वीर तो सबने ले ली,
रास्ते की टूटी बेंच पर शायद ही नज़र गई,
सफ़र अक्सर वहीं अपना चेहरा दिखाता है,
जहाँ बाकी दुनिया जल्दी में आगे निकल गई।
रास्ते की टूटी बेंच पर शायद ही नज़र गई,
सफ़र अक्सर वहीं अपना चेहरा दिखाता है,
जहाँ बाकी दुनिया जल्दी में आगे निकल गई।
180
लौटते वक़्त बैग वही था, सामान वही,
रास्ता वही, टिकट वही, पहचान वही,
फिर भी कुछ बदल चुका था भीतर,
शायद यही सफ़र है, जो दिखता कहीं नहीं।
रास्ता वही, टिकट वही, पहचान वही,
फिर भी कुछ बदल चुका था भीतर,
शायद यही सफ़र है, जो दिखता कहीं नहीं।
181
जेब में रखा मोबाइल कभी-कभी काम आ जाता है,
बिना तैयारी का लम्हा भी थम-सा जाता है,
बड़ा कैमरा घर पर रह जाए तो रहने दो,
अच्छी नज़र साथ हो तो रास्ता तस्वीर बन जाता है।
बिना तैयारी का लम्हा भी थम-सा जाता है,
बड़ा कैमरा घर पर रह जाए तो रहने दो,
अच्छी नज़र साथ हो तो रास्ता तस्वीर बन जाता है।
182
माँ ने कहा—ज़रा एक तस्वीर ले दे मेरी,
बाल ठीक हैं न, यह साड़ी लग रही है न मेरी,
मैंने बस मोबाइल उठाकर हँसते हुए तस्वीर ली,
अब वही तस्वीर सबसे प्यारी है मेरी।
बाल ठीक हैं न, यह साड़ी लग रही है न मेरी,
मैंने बस मोबाइल उठाकर हँसते हुए तस्वीर ली,
अब वही तस्वीर सबसे प्यारी है मेरी।
183
दोस्तों ने कहा—जल्दी कर, गाड़ी निकल जाएगी,
मैंने कहा—बस एक तस्वीर, फिर राह मिल जाएगी,
कौन जानता था वही आख़िरी साथ का सफ़र होगा,
अब वह छोटी-सी तस्वीर उम्र भर साथ जाएगी।
मैंने कहा—बस एक तस्वीर, फिर राह मिल जाएगी,
कौन जानता था वही आख़िरी साथ का सफ़र होगा,
अब वह छोटी-सी तस्वीर उम्र भर साथ जाएगी।
184
मोबाइल की छोटी-सी खिड़की में शाम उतर आई,
छत पर बैठी चाय में आधी दुनिया समा आई,
तस्वीर बहुत बड़ी बात नहीं थी शायद,
पर उस दिन की थकान उसमें मुस्करा आई।
छत पर बैठी चाय में आधी दुनिया समा आई,
तस्वीर बहुत बड़ी बात नहीं थी शायद,
पर उस दिन की थकान उसमें मुस्करा आई।
185
कभी धुँधली तस्वीर भी दिल को साफ़ लगती है,
कभी साधारण-सी तस्वीर भी ख़ास लगती है,
मोबाइल क्या है, बस एक बहाना है,
जिसमें अपना कोई हो, वही तस्वीर अच्छी लगती है।
कभी साधारण-सी तस्वीर भी ख़ास लगती है,
मोबाइल क्या है, बस एक बहाना है,
जिसमें अपना कोई हो, वही तस्वीर अच्छी लगती है।
186
राहों पर बारिश उतरी, शहर भीगता रहा,
मैं छज्जे तले खड़ा हर मंज़र पढ़ता रहा,
शीशे पर ठहरी एक बूँद ने तस्वीर गढ़ दी,
लम्हा बिना दस्तक आया, दिल उसे देखता रहा।
मैं छज्जे तले खड़ा हर मंज़र पढ़ता रहा,
शीशे पर ठहरी एक बूँद ने तस्वीर गढ़ दी,
लम्हा बिना दस्तक आया, दिल उसे देखता रहा।
187
सूरज ढला तो रंग बिखरते रहे आसमान पर,
हम ठहर गए उसी पल, उसी शाम के गुमान पर।
तस्वीर में कहाँ उतर पाई वह रौशनी आँखों वाली,
मगर याद आज भी ठहरी है दिल के उसी मकान पर।
हम ठहर गए उसी पल, उसी शाम के गुमान पर।
तस्वीर में कहाँ उतर पाई वह रौशनी आँखों वाली,
मगर याद आज भी ठहरी है दिल के उसी मकान पर।
188
बच्चा भागा, पीछे हँसी की झंकार थी,
ढलती शाम भी जैसे उसी की राज़दार थी।
बस यूँ ही कैमरा उठा, वह पल ठहर-सा गया,
जिसे ढूँढ़ा नहीं था, वही तस्वीर यादगार थी।।
ढलती शाम भी जैसे उसी की राज़दार थी।
बस यूँ ही कैमरा उठा, वह पल ठहर-सा गया,
जिसे ढूँढ़ा नहीं था, वही तस्वीर यादगार थी।।
189
घर की पुरानी दीवार पर धूप की एक लकीर थी,
मेज़ पर ठंडी चाय, आधी खुली तस्वीर थी,
यूँ ही उस दोपहर को तस्वीर में रख लिया था,
तब क्या ख़बर थी, वही सादगी मेरी जागीर थी।।
मेज़ पर ठंडी चाय, आधी खुली तस्वीर थी,
यूँ ही उस दोपहर को तस्वीर में रख लिया था,
तब क्या ख़बर थी, वही सादगी मेरी जागीर थी।।
190
हर तस्वीर को सँवारना ज़रूरी नहीं होता,
हर चेहरे को निखारना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ चेहरे अपनी सादगी में ही दिल जीत लेते हैं,
हर सच को बदलकर दिखाना ज़रूरी नहीं होता।।
हर चेहरे को निखारना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ चेहरे अपनी सादगी में ही दिल जीत लेते हैं,
हर सच को बदलकर दिखाना ज़रूरी नहीं होता।।
191
एक संदेश में पुरानी तस्वीर उतर आई,
देखते ही बीते दिनों की धूप निखर आई।
मोबाइल की ख़ामोश तहों में कितनी शामें सोई हैं,
एक तस्वीर खुली और पूरी छुट्टी लौट आई।।
देखते ही बीते दिनों की धूप निखर आई।
मोबाइल की ख़ामोश तहों में कितनी शामें सोई हैं,
एक तस्वीर खुली और पूरी छुट्टी लौट आई।।
192
पिता तस्वीर में हमेशा तनकर खड़े हो जाते हैं,
माँ कहती हैं—“ज़रा ठीक से लेना” पर वे मुस्कुराते हैं,
इन छोटी-सी आदतों में पूरे घर के रंग समाते हैं,
वक़्त गुजरता है तो यही मामूली पल सबसे ज़्यादा याद आते हैं।
माँ कहती हैं—“ज़रा ठीक से लेना” पर वे मुस्कुराते हैं,
इन छोटी-सी आदतों में पूरे घर के रंग समाते हैं,
वक़्त गुजरता है तो यही मामूली पल सबसे ज़्यादा याद आते हैं।
193
जगह कम पड़ी तो तस्वीरें छाँटने बैठा था,
हर एक में कोई बीता हुआ मौसम ठहरा था,
बहुत-सी थीं जिन्हें मिटाना आसान समझा था,
मगर उँगली जहाँ पहुँची, वहीं दिल ठहरा था।
हर एक में कोई बीता हुआ मौसम ठहरा था,
बहुत-सी थीं जिन्हें मिटाना आसान समझा था,
मगर उँगली जहाँ पहुँची, वहीं दिल ठहरा था।
194
हाथों का पुराना साथी बदला, तस्वीरें फिर भी साथ रहीं,
कितनी राहें, कितनी शामें, दिल के कितने पास रहीं।
घर बदले, शहर बदलते रहे, यादें वहीं आबाद रहीं,
कुछ खुशबुएँ थीं बीते कल की जो उम्र भर साथ रहीं।
कितनी राहें, कितनी शामें, दिल के कितने पास रहीं।
घर बदले, शहर बदलते रहे, यादें वहीं आबाद रहीं,
कुछ खुशबुएँ थीं बीते कल की जो उम्र भर साथ रहीं।
195
रात का चाँद हथेली में छोटा-सा उतर आया,
आँखों ने जितना देखा, कहाँ तस्वीर में समा पाया।
फिर भी उस अधूरे अक्स को दिल ने सहेज लिया,
कुछ यादों को उम्र भर का एक बहाना मिल गया।
आँखों ने जितना देखा, कहाँ तस्वीर में समा पाया।
फिर भी उस अधूरे अक्स को दिल ने सहेज लिया,
कुछ यादों को उम्र भर का एक बहाना मिल गया।
196
दादी ने तस्वीर देखी—हँसी में मासूम-सी हैरानी थी,
“मैं इतनी बूढ़ी कब हो गई?” आँखों में फिर भी लड़की-सी नादानी थी।
हम देर तलक हँसते रहे, फिर तस्वीर को चुपचाप सहेज लिया,
एक छोटे-से मोबाइल ने उस शाम पूरे घर का बचपन लौटा दिया।
“मैं इतनी बूढ़ी कब हो गई?” आँखों में फिर भी लड़की-सी नादानी थी।
हम देर तलक हँसते रहे, फिर तस्वीर को चुपचाप सहेज लिया,
एक छोटे-से मोबाइल ने उस शाम पूरे घर का बचपन लौटा दिया।
197
सुबह की चाय थी, खिड़की पर धूप ठहरी थी,
न कोई बड़ा मंज़र बस ख़ामोशी सुनहरी थी।
यूँ ही मोबाइल में सहेज लिया था वह मामूली-सा पल,
बाद में जाना कि ज़िंदगी वहीं थी, जो चुपचाप बिखरी थी।
न कोई बड़ा मंज़र बस ख़ामोशी सुनहरी थी।
यूँ ही मोबाइल में सहेज लिया था वह मामूली-सा पल,
बाद में जाना कि ज़िंदगी वहीं थी, जो चुपचाप बिखरी थी।
198
सफ़र में बैटरी कम थी, मगर मंज़र बेहिसाब थे,
हर मोड़ पर ठहरे हुए कुछ अनकहे से ख़्वाब थे।
फिर फ़ोन जेब में रख दिया, राह को आँखों से पढ़ लिया,
कुछ लम्हे तस्वीरों के नहीं, बस दिल में रहने के लिए थे।
हर मोड़ पर ठहरे हुए कुछ अनकहे से ख़्वाब थे।
फिर फ़ोन जेब में रख दिया, राह को आँखों से पढ़ लिया,
कुछ लम्हे तस्वीरों के नहीं, बस दिल में रहने के लिए थे।
199
हथेली में कैमरा आया तो हर मंज़र आसान हुआ,
गुज़रता हुआ हर लम्हा यादों का मेहमान हुआ।
अब मुश्किल बस इतनी है कि निगाह ठहरे भी तो कहाँ,
हर चीज़ तस्वीर हुई, मगर क्या देखने लायक है यही नज़र का इम्तिहान हुआ।।
गुज़रता हुआ हर लम्हा यादों का मेहमान हुआ।
अब मुश्किल बस इतनी है कि निगाह ठहरे भी तो कहाँ,
हर चीज़ तस्वीर हुई, मगर क्या देखने लायक है यही नज़र का इम्तिहान हुआ।।
200
तस्वीर भेजी, उधर दिलों के निशान आते रहे,
पल भर में लोग अपने अपने फ़ैसले सुनाते रहे।
मैंने मोबाइल रख दिया, फिर वही तस्वीर चुपचाप देखी,
जो दिल में ठहर गई, उसी से हम दिन भर मुस्कराते रहे।।
पल भर में लोग अपने अपने फ़ैसले सुनाते रहे।
मैंने मोबाइल रख दिया, फिर वही तस्वीर चुपचाप देखी,
जो दिल में ठहर गई, उसी से हम दिन भर मुस्कराते रहे।।




