मोबाइल कैमरा फोकस कैसे करते हैं | कौन सा ऑटोफोकस बेहतरीन है?

क्या आपने कभी सोचा है कि मोबाइल कैमरा फोकस कैसे करते हैं, जबकि डीएसएलआर जैसे इनके लेंस आगे पीछे भी नहीं होते ?

यदि आपके पास सालों पुराना Nokia 6600 जैसा फिक्स्ड फोकस कैमरा फोन नहीं है तो ये बात जानने लायक है कि आज के अधिकतर मोबाइल कैमरा ऑटोफोकस (AF) तकनीक से लैस हैं  |

यही नहीं एक स्मार्टफोन के लेंस जो कैमरा मोड्यूल के भीतर रहते हैं आगे-पीछे हो सकते हैं जिससे हमें बेहतर ऑटो फोकस मिल सके|

पर क्या आपको पता है कि आप के  कैमरा मोबाइल में कितने तरह के ऑटोफोकस होते हैं और उनमें से हर एक कैसे काम करता है?

जब भी आप कैमरा फोन के स्पेसिफिकेशन को देखेंगे तब PDAF, CDAF, लेज़र या ड्यूल पिक्सेल ऑटोफोकस जैसे कठिन शब्द आपको कंफ्यूज कर देते हैं |

आज हम यह  चर्चा करेंगे कि मोबाइल कैमरा फोकस कैसे करते हैं और कौन सी ऑटोफोकस तकनीक आपके लिए बेहतरीन है?

इसके अलावा विभिन्न तकनीकों और और भविष्य में आने वाली MEMS ऑटोफोकस तकनीक पर भी चर्चा करेंगे |

आगे बढ़ने से पहले आप नीचे दिए गए पोल में भाग लेना न भूलें |

विषय-सूची छिपाएं

 

ऑटो फोकस क्या है | What is AutoFocus?

मोबाइल कैमरा फोकस कैसे करते हैं

स्मार्टफोन में एक कैमरा मोड्यूल होता है जिसमे लेंस और सेंसर साथ साथ होते हैं |

लेंस बाहर के प्रकाश को सेंसर पर डालता है जिससे फोटो खिंच जाती है |

कैमरे में उत्तल लेंस (Convex Lens) होता है जो बाहर से आने वाली रोशनी को सेंसर पर केंद्रित (focus) करता है |

सेंसर इसी को डिजिटल माध्यम से एक फोटो में तब्दील कर मेमोरी कार्ड में सुरक्षित कर लेता है |

पर असल दुनियाँ में यह बहुत ही मुश्किल है कि कैमरा एक बार में ही सही फोकस कर ले| 

ध्यान दें : किसी सब्जेक्ट से टकरा कर लेंस के माध्यम से आने वाला सारा प्रकाश जब पूरी तरह से सेंसर पर फोकस हो जाता है तभी शार्प फोटो आती है |

यह कुछ वैसा ही है जब हम कहते हैं कि हमारा दिमाग तभी शार्प रहता है जब हम ध्यान केन्द्रित (concentrate या focus) करते हैं |

किसी विषयवस्तु (Object)  से टकरा कर आती हुई रोशनी किस कोण पर फोकस करेगी इसका निर्धारण Object और लेंस के बीच की दूरी से ही तंय होता है |

इसीलिए कैमरा यदि फिक्स्ड फोकस वाला है तब हमें ही आगे-पीछे होना पड़ेगा जब तक सही कोण न बन जाये और कैमरा सही फोकस प्राप्त न कर ले |

पर अगर हमारा कैमरा ऑटोफोकस वाला है तब वह खुद ही आगे-पीछे होकर फोकस कर लेगा जिससे साफ तस्वीर आ सके |

मोबाइल कैमरा फोकस कैसे करते हैं [ऑटोफोकस के प्रकार]

सटीक ऑटो फोकस प्राप्त करने के लिए मोबाइल कैमरे इन नीचे दिए गए तकनीकों का प्रयोग करते हैं :

1. फेज डिटेक्शन ऑटोफोकस | Phase Detection Autofocus [PDAF]

अब आप पूछेंगे – PDAF क्या होता है?

PDAF का full form होता है Phase Detection Autofocus |

यदि आपने मोबाइल कैमरे की स्पेसिफिकेशन पढ़ी है तब आप इस शब्द से ज़रूर वाकिफ़ होंगे |

PDAF फोकस करने की एक नई तकनीक है जो बहुत सारे फ्लैगशिप स्मार्टफोन कैमरों (एप्पल, सैमसंग, गूगल आदि) में मिलती है |

Phase Detection Autofocus (PDAF) तकनीक मैकेनिकल मूवमेंट (जैसे सही फोकस के लिए लेंस को आगे -पीछे करना ) का अधिक प्रयोग न कर के इमेज प्रोसेसिंग पर ही निर्भर रहती है | 

जैसे ही प्रकाश लेंस से गुजरता है तभी कैमरा उसकी जांच करता है और लेंस के पिछली ओर रखे हुए छोटे छोटे सेंसर फोटो दिओदेस छवियों को जोड़ो में विभाजित कर आपस में तुलना करते हैं |

 

अगर फोकस सही हो रहा हैं तब ये दोनों छवियां overlap हो जाएँगी (देखें नंबर -2)

अगर फोकस ठीक से नहीं हो रहा होगा तब कैमरा सिस्टम लेंस की स्थिति बदलता रहेगा जब तक overlap प्रोफाइल न बन जाये |

फेज़ डिटेक्शन ऑटोफोकस (PDAF) के क्या फायदे हैं ?

  • PDAF तकनीक में फोकस करने के लिए लेंस का mechanical movement कम से कम होता हैं इसलिए यह काफी तेज़ फोकस करता हैं |
  • यह कंट्रास्ट डिटेक्शन (CDAF ) तकनीक से लगभग तिगुना तेज़ फोकस करता हैं | इसका फायदा हमें उस स्थान पर मिलता हैं जहाँ लगातार फोकस की आवश्यकता रहती हैं जैसे खेल कूद या बच्चों का भागना दौड़ना |
  • वीडियो शूट के लिए फेज़ डिटेक्शन ऑटोफोकस तकनीक एकदम सटीक हैं |

फेज़ डिटेक्शन ऑटोफोकस की कमियां क्या हैं ?

  • इस तकनीक में सेंसर के कुछ पिक्सल लगातार उपयोग में आते रहते हैं जिससे कई बार कम रोशनी में तुरंत फोकस नहीं होता |
  • PDAF तकनीक मीडियम से हाई एंड कैमरा फोन में उपलब्ध हैं पर बेसिक फोन में अभी यह नहीं है |

2. कंट्रास्ट डिटेक्शन ऑटोफोकस | Contrast Detection Autofocus [CDAF]

CDAF का full form होता है Contrast Detection Autofocus |

CDAF तकनीक किसी ऑब्जेक्ट के कंट्रास्ट पर पूरी तरह से निर्भर रहती हैं |

सबसे पहले कैमरा सेंसर, लेंस की पहली अवस्था में ही यह पता करता है कि किसी सब्जेक्ट में कितना कंट्रास्ट हैं |

उसके बाद कैमरा प्रणाली लेंस को अपनी स्थिति बदलने का संकेत देती हैं जिससे नए स्थान पर कंट्रास्ट पता चल सके | 

अब सेंसर, लेंस की इन दोनों जगहों पर कंट्रास्ट की तुलना करता हैं और यह पता लगता हैं कि सही फोकस के लिए लेंस को किस स्थान पर रखना हैं |

जब फोकस एकदम सटीक होगा तब उस समय सब्जेक्ट का कंट्रास्ट सबसे अधिक होगा |

यह तकनीक काफ़ी पुरानी है और साधारण मोबाइल कैमरा में प्रयोग की जाती है | 

कंट्रास्ट डिटेक्शन ऑटोफोकस (CDAF) के फायदे क्या हैं?

  • CDAF एक पुरानी, सस्ती और भरोसेमंद तकनीक हैं जो बहुत सारे मोबाइल फ़ोन में पायी जाती हैं|
  • कंट्रास्ट डिटेक्शन ऑटोफोकस रुके हुए सब्जेक्ट की फोटो खींचने के लिए बिलकुल उपयुक्त है |

कंट्रास्ट डिटेक्शन ऑटोफोकस की क्या कमियां हैं?

  • तेज़ चलने वाले सब्जेक्ट जैसे खेल कूद को शूट करना मुश्किल होता हैं क्योंकि इसमें कंटीन्यूअस फोकस सही परिणाम नहीं दे पाता है | 
  •  चूँकि इस तकनीक में लेंस फोकस प्राप्त करने के लिए कई बार आगे पीछे होता हैं इसलिए यह बहुत धीमा होता है और कई बार फोकस के दौरान लेंस से आवाज़ भी आती हैं |
  • कई बार अलग अलग प्रकार की रोशनी में जब सब्जेक्ट के कंट्रास्ट का सही पाता नहीं चल पाता हैं तब भी Contrast Detection Autofocus (CDAF) काम नहीं आता हैं |

3. लेज़र ऑटोफोकस | Laser Autofocus 

लेज़र ऑटो फोकस

लेज़र ऑटोफोकस एक ऐसी तकनीक है जिसमें infrared light beam का उपयोग सब्जेक्ट की स्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है |

यही लाइट बीम ये भी गणना करती हैं कि कोई सब्जेक्ट कितनी दूरी पर हैं |

लेज़र ऑटोफोकस तकनीक में कैमरे के भीतर एक इन्फ्रारेड मोड्यूल होता हैं जो इंफ्रारेड किरणें छोड़ता हैं | 

ये किरणें जब किसी चीज़ से टकरा कर वापस सेंसर पर आती हैं तब यह दूरी और समय की गणना करके लेंस का फोकस उसी हिसाब से तंय करता है |

यह तकनीक सबसे पहले LG ने विकसित की और 2014 में LG-G3 में सफल प्रयोग भी किया |

कुछ और स्मार्टफोन जिसमे इस तकनीक का प्रयोग होता था वह थे Asus Zenfone Laser, One Plus 2, LG G4/G5/V30 |

हांलाकि आजकल लेज़र ऑटो फोकस का प्रयोग बहुत कम हो गया है |

लेज़र ऑटोफोकस के फायदे क्या हैं ?

  • कंट्रास्ट डिटेक्शन (CDAF) की अपेक्षा यह काफ़ी तेज़ी से फ़ोकस करता हैं | 
  • यह कम रोशनी में भी अच्छा काम करता हैं क्योंकि इसकी एक अपनी ही एक लाइट बीम होती है | 

लेज़र ऑटोफोकस की कमियां क्या हैं ?

  • यदि कोई सब्जेक्ट बहुत अधिक दूरी पर हैं तब लेज़र ऑटोफोकस तकनीक में फोकस प्राप्त करने में परेशानी होती हैं | 
  • यदि हम कोई तस्वीर ऐसी ले रहें है जिसमे प्रतिबिम्ब आते हों जैसे पानी या ग्लास तब यह तकनीक काम नहीं करती | 

4. ड्यूल पिक्सल ऑटोफोकस | Dual Pixel Autofocus 

Dual Pixel Autofocus तकनीक एक तरह से PDAF पर ही काम करती है पर यह उसका एडवांस वर्शन है |  

PDAF में प्रत्येक पिक्सल का लगभग 5 -8 % हिस्सा ही फ़ोकस के लिए उपयोग में लाया जाता है परन्तु ड्यूल पिक्सेल में लगभग सौ प्रतिशत उपयोग होता है |

इसी कारण से ड्यूल पिक्सल ऑटोफोकस, PDAF से बेहतर कार्य करते हैं और इसे अभी तक का सबसे बेहतरीन ऑटोफोकस तकनीक कहा जा सकता है |

ड्यूल पिक्सेल ऑटोफोकस के बारे में और अधिक जानने के लिए आप यहाँ देखें |

Dual Pixel ऑटो फोकस
Credit: Samsung & gsmarena

Samsung S7/S7 Edge पहले ऐसे स्मार्टफोन थे जिसमे ड्यूल पिक्सेल ऑटोफोकस तकनीक का प्रयोग हुआ था |

इसमें 1/2.5″ Sony IMX260 सेंसर का उपयोग किया गया था और बड़े पिक्सल आकार के कारण यह कम रोशनी में भी तुरंत फ़ोकस कर लेता था |

अब आप सोचेंगे कि यहाँ सैमसंग S20/नोट 20 और iPhone 11/12 के समय हम पुराने S7 की बात कर रहे हैं |

आप यह समझ लें कि ड्यूल पिक्सेल तकनीक कैनन के DSLR में प्रयोग में लाई जाती है और सैमसंग ने इसे मोबाइल कैमरे में पहली बार उतारा था |

तब से ले कर अब तक सैमसंग के सभी फ्लैगशिप स्मार्टफोन में ड्यूल पिक्सल तकनीक का ही प्रयोग हो रहा है और यह बेहतरीन है |

हांलाकि अब तो एप्पल, गूगल, LG, Redmi इत्यादि कंपनियों ने भी ड्यूल पिक्सल ऑटो फोकस तकनीक का प्रयोग अपने कैमरा फोन में करना शुरू कर दिया है |

ध्यान दें : Dual Pixel Autofocus मोबाइल फोटोग्राफी के लिए बेहतरीन फोकस तकनीक है |

5. हाइब्रिड ऑटोफोकस | Hybrid Autofocus 

ऊपर बताये गए ऑटोफोकस तकनीकों में हमनें देखा कि कोई भी तकनीक अपने आप में पूर्ण नहीं है, तब इसका क्या इलाज़ है |

इसी बात को ध्यान में रखते हुए कुछ कम्पनियों ने हाइब्रिड या multiple focusing system का प्रयोग करना चालू किया जिससे प्रत्येक में होने वाली कुछ कमियों को दूर किया जा सके | 

Sony ने सबसे पहले 2015-16 के आस पास अपने Xperia X और Z  सीरीज़ में Predictive Hybrid Autofocus का उपयोग करना शुरू किया जिसमे फेज डिटेक्शन (PDAF) और कंट्रास्ट डिटेक्शन (CDAF) एक साथ शामिल थे |

Sony ने यह तकनीक अपने मिररलेस कैमरा A-6000 series से लेकर स्मार्टफोन में उपयोग किया था |

इस तकनीक में PDAF पहले तो दूरी के हिसाब से फ्रेमिंग तंय करता है फिर फोकस लॉक करता है |

उसके बाद CDAF किसी सब्जेक्ट के कंट्रास्ट का पता करता है और फोकस को और बेहतर बनाता है जिससे तस्वीर एकदम साफ़ आ सके |

Predictive hybrid autofocus तकनीक में कम समय और कम रोशनी में बेहतर focus मिलता है  | 

Sony के अलावा Google ने भी अपने Pixel सीरीज़ में Phase detection और Laser autofocus  का एकसाथ प्रयोग किया |

मोबाइल कैमरा ऑटो फोकस का भविष्य 

आज के समय में स्मार्टफोन ही एक चीज़ है जो सबसे अधिक प्रचलित है |

आज के समय में सभी चाहते हैं कि उनका स्मार्टफोन कैमरा भी किसी डिजिटल कैमरा को टक्कर दे सके |

पर यहाँ यह बात ध्यान देने वाली है कि डिजिटल कैमरे का मुख्य उद्देश्य है फोटो खींचना और मोबाइल फ़ोन का बात करना,  इसलिए जो फोकस सेटअप किसी DSLR में उपयोग होता है वह किसी मोबाइल के आकार और वज़न को ध्यान में रखते हुए उपयोग नहीं किया जा सकता है |

ऑटो फोकस को काम करने के लिए किसी लेंस ड्राईवर (लेंस को आगे पीछे करने वाला) की आवश्यकता होती है |

इस काम के लिए stepping motor का उपयोग होता है जो लेंस ऑटोफोकस और ज़ूम, दोनों के लिए प्रयोग किया जाता है |

पर यह उपकरण केवल डिजिटल कमरों तक ही सीमित है क्योंकि एक तो इसका आकार बड़ा है और दूसरा यह बहुत बैटरी खाता है जिससे इसका उपयोग मोबाइल में नहीं हो सकता |

Voice Coil Motor (VCM ) ऑटो फोकस तकनीक क्या है ?

camera lens focus
© Raimond Spekking / CC BY-SA 4.0 (via Wikimedia Commons)

आज के बाज़ार में VCM सबसे छोटी और कम लागत वाली ऑटोफोकस तकनीक है जो लेंस मॉड्यूल को स्थानांतरित करने और फोकस बदलने के लिए एक मोबाइल कैमरे में उपयोग की जा रही है |

इस तकनीक में एक  इलेक्ट्रोमैग्नेट (कॉइल) से करंट गुजारा जाता है जिसके कारण एक चुम्बकीय क्षेत्र (magnetic field) पैदा होता है  | 

लेंस होल्डर में भी एक चुम्बकीय तत्व होता है जो इलेक्ट्रोमैग्नेट (कॉइल) के विपरीत होता है |

जब भी लेंस को फोकस करने के लिए आगे या पीछे करना होता है तभी कैमरा module एक इलेक्ट्रिक संकेत देता है जिससे कॉइल चार्ज हो जाता है और चुम्बकीय क्षेत्र बनाता है|

चूँकि लेंस होल्डर का चुम्बक इसके बिलकुल उल्टा होता है इसलिए वह दूर चला जाता है |

लेंस होल्डर को वापस लाने के लिए एक स्प्रिंग का प्रयोग होता है |

जब चुम्बकीय क्षेत्र का प्रभाव ख़त्म हो जाता है तब यह तनी हुई स्प्रिंग अपनी पुरानी स्थिति में आ जाती है | 

VCM तकनीक बहुत पुरानी है (इसका प्रयोग लाउड स्पीकर में भी होता है) और अधिक शक्ति का उपयोग करती हैं जिससे बैटरी जल्दी खत्म हो जाती है |

इससे अधिक गर्मी भी उत्पन्न होती है जो optical गुणवत्ता को कम कर देती है।

स्मार्टफोन कैमरा ऑटो फोकस का भविष्य क्या है?

auto focus

बदलते समय के साथ साथ स्मार्टफोन में इन चीज़ों की मांग बढ़ने लगी :

  • हल्का और पतला आकार
  • अधिक मेगापिक्सेल कैमरा 
  • बड़ा अपर्चर (f /2.2, f/2, f/1.7  से अब f/1.5  Samsung S9/S10 में )
  • अधिक बैटरी 

ऊपर बताये गए मांगों के लिए अभी VCM तकनीक तैयार नहीं था क्योंकि इसके लिए चाहिए छोटे आकार का कॉइल, चुम्बक और स्प्रिंग जो कि मुमकिन नहीं है |

चूँकि चुम्बकीय बल (magnetic force) का सीधा सम्बन्ध आकार (size /volume) से है इसलिए छोटा आकार होने कि वजह से कम चुम्बकीय बल होगा और तभी लेंस होल्डर को हिलाने के लिए जरूरत से अधिक करंट की आवश्यकता होगी |

अब अधिक करंट मतलब अधिक गर्मी और खराब optical performance |

इसके अलावा समय के साथ साथ स्प्रिंग के कमज़ोर होने के कारण autofocus भी मुश्किल हो जाता है |

अब मोबाइल संसाधनों के लिए गति, शक्ति और प्रदर्शन की आवश्यकताएं भी बदल गई हैं |

पूरी तरह से मजबूर मोबाइल कंपनियों ने अब MEMS actuator के पक्ष में अपना फैसला सुनाते हुए वॉयस कॉइल मोटर (VCM) की पुरानी विधि से किनारा करना शुरू कर दिया है |

MEMS ऑटो फोकस तकनीक क्या है | What is MEMS Autofocus?

अभी OPPO स्मार्टफोन कंपनी ने MEMS तकनीक में रूचि दिखाई है | 

MEMS या माइक्रो-इलेक्ट्रो-मैकेनिकल-सिस्टम में एक से 100 माइक्रोमीटर के घटकों का उपयोग हो सकता है।

यह तकनीक ऑटो फोकस करने के लिए एल्क्ट्रोमैग्नेट का उपयोग न कर के इन तीन तरीकों से  कार्य करती हैं –

  • इसमें एक actuator होता है जो सीधी रेखा में चल सकता है |
  • इसमें अपनी पुरानी स्थिति पर वापस आने के लिए स्प्रिंग भी होती है |
  • लेंस को आगे पीछे करने के लिए यह एक इलेक्ट्रिक कंघी (electrostatic comb) का प्रयोग करता है |

इस तकनीक में चुम्बकीय क्षेत्र का प्रयोग नहीं होता है इसलिए बैटरी की खपत भी कम होती है और optical performance भी कई गुना बढ़ जाती है |

इस तकनीक का प्रयोग करने से स्मार्टफोन का आकार लगभग 5 -8  गुना कम हो जायेगा और ऑटो फोकस गति भी लगभग 5 -6  गुना बढ़ जाएगी | 

और अंत में…

इस परिपक्व होते स्मार्टफोन बाज़ार में कंपनियों को तलाश है कुछ नयेपन की, कुछ उम्दा जिससे इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में वो भी बचे रह सकें |

अब यह बाज़ार केवल बड़ी कंपनियों जैसे Apple, Samsung, LG इत्यादि तक ही सीमित नहीं रह गया है और उपभोगताओं को तलाश है एक बेहतर मोबाइल कैमरा की चाहे वह कोई भी ब्रांड का हो |

आज कम्पनियाँ अपने फ़ोन में एक से दो होते हुए अब चार कैमरे तक पेश कर चुकी हैं, पर समय के साथ यह देखना होगा कि इस तकनीक से वह डीएसएलआर और स्मार्टफोन के बीच को खाई को कितना भर सकते है |

बेहतर ऑटोफोकस के लिए अब OPPO जैसी कम्पनियाँ पुराने VCM तकनीकों को छोड़कर एकदम नए MEMS तकनीक से जुड़ चुकी है |

अब सभी को इंतज़ार है कि कब स्मार्टफोन का ऑटो फोकस एक डीएसएलआर की बराबरी कर पायेगा |

हमें कमेंट कर के बताएं की आप कौन सी ऑटो फोकस तकनीक वाले स्मार्टफोन कैमरे का उपयोग करते हैं? 

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